Wednesday, 10 May 2017

सुनो, शोर ना करो


रात का कोई आवारा टुकड़ा
शहर से अपने मिलों दूर पड़ा
कहीं गर्त में बैठा, यूँ पड़ा पड़ा
जीने के मायने खोज रहा है
शोर ना करो, शहर ये सो रहा है

कीट पतंग भी भनक भनक कर
ऊब चुके हैं टूटे हिस्से पर बैठ कर
हाथ से हौंक कर डूबे सूरज को दूर करके
शहर मेरा जाने कैसे, उफ चैन से सो रहा है

कल भोर तो होगी, बेशक माथे तक चमकदार
फिर रात का वो आवारा बेखबर टूटा टुकड़ा
इक कमरे की खूंट पर सपने सारे टाँग कर
चैन से, जाने कैसे , फिर बेखौफ सो रहा होगा

सुनो, शोर ना करो।

2 comments:

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