Wednesday, 12 April 2017

कोई ग़म है तुम्हें

तुमसे बातें करते हुए
कई दफे ऐसा हुआ कि
क्या कहना था भूल गए
मगर ग़म नहीं है

चकोर जैसे देखता है चाँद
ध्यान लगाए, खोता जाता हूँ
मगर कोई ग़म नहीं है

फिर अचानक जब तुम कहती हो
मैं कितना बक बक करती हूँ ना
ऐसा लगता है जैसे नींद तोड़ दिया
और सपने रह गए प्यासे
मगर ग़म नहीं है

तुम्हारा रूठ जाना
के मैं सुनता नहीं बातें तुम्हारी
मेरा बरबस मनाना
और कई मेरी आदतें पुरानी
हमेशा अजीब लगता है
पर ग़म नहीं है

तुम कितनी परेशान होती हो
जब मैं क्रिकेट देखता हूँ
दबी जबान से कुढ़ती हो
गालियाँ देती हो सबको

और हँसकर जब मैं
देखता हूँ तुम्हे प्यार से
कैसे मोम हो जाती हो,
जैसे बर्फ गिरा दिया हो
किसी ने मह के प्याले में

फिर बताओ के कैसे
कोई ग़म रहे शेष।

कहो, कोई ग़म है तुम्हें?

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