Tuesday, 11 April 2017

मैं लिखता नहीं हूँ अब


मैं लिखता नहीं हूँ अब
तुम्हारे चले जाने के बाद
शायद शब्द ले गयी तुम
ले गयी मेरे गीत के बोल

कई बसंत आये, चले गए
कच्ची मेहँदी की खुश्बू भी
शाम के प्याले खाली हैं अब
रात आगोश में नहीं लेती सब

आँखों के काजल झुठला देते हैं
वो किमाम भी फरेब लगती है
अदाएँ जो जान लिया करती थीं
गली के मुहाने से लौट जाती हैं

वो पते जहाँ हम मिला करते थे
वो आँखें जहाँ साँस टिकते थे
झुका लेती हैं नज़रें जब देखो
कहती कोई रहता नहीं रुकने को

1 comment:

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